दानिय्येल की पुस्तक - हर अध्याय की व्याख्या | Book of Daniel All Chapters Explained in Hindi

📖 दानियेल की पुस्तक – अध्याय 1 ( Book of Daniel – Chapter 1 ) 🌟 अध्‍याय की झलक: यह अध्‍याय दानियेल और उनके तीन साथियों के जीवन की शु...

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बुधवार, 2 सितंबर 2020

 


लेखक: मूसा निर्गमन की पुस्तक के लेखक थे (निर्गमन 17:14; 24: 4-7; 34:27)।

लेखन की तारीख: निर्गमन की पुस्तक 1440 और 1400 ई.पू. के बीच लिखी गई थी।

लेखन का उद्देश्य: शब्द "निर्गमन " का अर्थ है प्रस्थान। मिस्र से इस्राएलियों के प्रस्थान ने अब्राहम के वंशजों के लिए सताव की अवधि को समाप्त कर दिया (उत्पत्ति 15:13), और अब्राहम से वाचा की पूर्ति की शुरुआत कि के उनके वंशज केवल जीवित नहीं रहेंगे बल्कि वादा किया हुआ देश फुले फलेंगे, और एक महान राष्ट्र बनेंगे (उत्पत्ति 12: 1-3, 7)। पुस्तक का उद्देश्य, मिस्र में याक़ूब के वंशजों की तेजी से वृद्धि तथा उनके वाचा की हुई भूमि में परमेश्वर के द्वारा बनाए गए आशिशित राष्ट्र की स्थापना के वर्णन के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

मुख्य वचन: निर्गमन 1: 8, "तब एक नया राजा, जो यूसुफ के बारे में नहीं जानता था, मिस्र में सत्ता में आया।"

निर्गमन 2: 24-25, "परमेश्वर ने उनकी कराह सुनी और वह इब्राहीम के साथ, इब्राहीम के साथ और याकूब के साथ अपनी वाचा को याद किया। इसलिए परमेश्वर ने इस्राएलियों को देखा और उनके बारे में चिंतित थे।"


निर्गमन 12:27, "यह यहोवा के लिए फसह का बलिदान है, जो मिस्र में इस्राएलियों के घरों के ऊपर से गुजरे और जब उन्होंने मिस्रियों को मारा तो हमारे घरों को बख्श दिया।" तब लोगों ने झुककर पूजा की। ”


निर्गमन 20: 2-3, "मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं, जिसने तुम्हें मिस्र से बाहर लाया, दासता की भूमि से निकाला। मेरे सामने तुम्हारा कोई अन्य देवता नहीं होगा।"


संक्षिप्त सारांश: निर्गमन शुरू होता है जहां उत्पत्ति समाप्त होती है परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों, यहूदियों के साथ व्यवहार करते हैं । यह उस समय को दर्शाता है जब इजरायल ने यूसुफ, जो मिस्र में शक्तिशाली था उसके मेहमानों के रूप में मिस्र में प्रवेश किया। जब उन्हें अंततः गुलामी के क्रूर बंधन से नहीं निकाला गया, जिसमें वे "... एक नए राजा ..." द्वारा डाले गए थे। जो यूसुफ को नहीं जानता था ”(निर्गमन 1: 8)।

अध्याय 1-14 में फिरौन के द्वारा यहूदियों के गुलामी में सताव का वर्णन है, उनके छुड़ाने वाले के रूप में मूसा का उदय, 10 विपत्तियाँ जो परमेश्वर ने मिस्त्र पर डालीं क्योकि फेरोन ने परमेश्वर की आज्ञा मानना न चाहा, और मिस्र से प्रस्थान, विपत्तियों व चमत्कारों में परमेश्वर के महात्म्य और सामर्थ को देखा जा सकता है - महामारी, पहलौठे की मृत्यु और पहले फसह का नियम - इस्राएलियों का छुटकारा, लाल सागर के बीच में से रास्ता निकालना, और मिस्र की सेना का विनाश। 

निर्गमन का मध्य भाग जंगल में भटकने और परमेश्वर द्वारा अपने लोगों के लिए किए गए अद्भुद कार्य और चमत्कारों के लिए समर्पित है। यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें स्वर्ग से रोटी, खारे से मीठा पानी, चट्टान से पानी दिया और उन जतियों पर विजय दी जो उन्हें नष्ट कर सकते थे। परमेश्वर ने अपने हाथों से पत्थर की पट्टियों पर नियम लिख कर दिये, और आग और बादल के खंभे के रूप में परमेश्वर की उपस्थिति उनके साथ रही फिर भी वे लगातार परमेश्वर के विरुद्ध बगावत करते रहे।

पुस्तक के अंतिम तीसरे भाग में वाचा के सन्दुक का निर्माण और इसके विभिन्न बलिदानों, वेदियों, बनावट के लिए लकड़ी का समान, समारोहों और आराधना के तरीकों का वर्णन है।

प्रतिबिंब: इस्राएलियों के लिए आवश्यक कई बलिदान चिन्हित करते थे उस निर्णायक बलिदान को यानि परमेश्वर के फसह के मेम्ने, यीशु मसीह को। मिस्र पर आखिरी विपत्ति की रात, एक निर्दोष मेमने को बलिदान किया गया था और इसका लहू परमेश्वर के लोगों के घरों की चौखटों पर लगाया गया था, जिसने उन्हें मौत के दूत से बचाया था। ये दर्शाता है परमेश्वर के निर्दोष मेमने यीशु मसीह को जो पापों के पश्चाताप के रूप मे बलिदान हुआ और जिसका लहू अनंतकाल के मृत्यु के डंक से बचाता है  (1 पतरस 1:19), इसी प्रकार निर्गमन 17: 6 में चट्टान से पानी निकालने की घटना है। जिस प्रकार मूसा ने लोगों को पीने का जीवनदायी जल प्रदान करने के लिए चट्टान पर मारा, उसी प्रकार परमेश्वर ने हमारे उद्धार की चट्टान को मारा, जोकि यीशु है, उसे हमारे पापों के लिए क्रूस पर मारा गया जिस से जीवन का जल निकला (यूहन्ना 4:10) । जंगल में मन्ना का दृश्य मसीह, के रूप में जीवन की रोटी (यूनान्न 6:48) का एक आदर्श चित्र है, जो हमें जीवन प्रदान करने के लिए परमेश्वर के द्वारा दी गयी है।

 व्यावहारिक प्रयोग: मूसा की व्यवस्था मानव जाति को दी गयी जिसने ये दर्शाया की वे इसे पालने में असमर्थ थे। हम व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते; इसीलिए पौलुस हमें "यीशु मसीह में अपना विश्वास रखने के लिए कहता है। हम केवल मसीह में विश्वास के द्वारा धर्मी ठहर सकते हैं, व्यवस्था के द्वारा नहीं, क्योंकि व्यवस्था के द्वारा कोई धर्मी नहीं ठहरता" (गलतियों 2:16)।

इस्राएलियों के लिए परमेश्वर के द्वारा किए गए प्रावधान दासत्व से मुक्ति और जंगल में मन्ना और बटेर, अपने लोगों के लिए उनकी दयालुता को स्पष्ट दर्शाता है। परमेश्वर ने हमारी सभी जरूरतों को पूरा करने का वादा किया है। "परमेश्वर सच्चा है, जिसने तुम्हें अपने पुत्र यीशु मसीह हमारे प्रभु के साथ संगति में बुलाया है" (1 कुरिन्थियों 1: 9)।

 हमें प्रभु पर भरोसा करना है, क्योंकि वह हमें किसी भी दासत्व से छुड़ा सकते है। लेकिन परमेश्वर पाप को सदा के लिए बिना दंड दिये नहीं जाने दे सकते। अतः  हम उनके न्याय और छुटकारे पर भरोसा कर सकते हैं। जब परमेश्वर हमें विषम परीस्थिति से निकालते है, तो हमें वापस उस ही में फसने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जब परमेश्वर हमें नियम और कानून देते हैं तो परमेश्वर चाहते हैं की हम उनपर चलें पर परमेश्वर दया और कृपा का प्रावधान भी साथ ही देते हैं क्योंकि वे जानते हैं की हम पूरी तरह से उनका पालन नही करेंगे। 


गुरुवार, 27 अगस्त 2020



 सबसे पहले हमें ये समझने की ज़रूरत है की शैतान सर्वव्यापी नहीं है। वह एक समय पर एक से अधिक स्थान में नहीं हो सकता। केवल परमेश्वर ही सर्वव्यापी हैं और अंतर्यामी हैं। केवल परमेश्वर सब कुछ जानते हैं और मनों को जांच और जान सकते हैं। शैतान अपनी सभी जानकारी के लिए अपनी सेना यानि दुष्तात्माओं पर निर्भर करता है।

तो क्या शैतान हमारे मनों, हमारी सोच को और हमारे ख़यालों को पढ़ सकता है ? जवाब है नहीं। (1 राजा 8:39) परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य के हृदय को जानते हैं और परमेश्वर के अतिरिक्त और कोई ऐसा नही है। परमेश्वर हमारे बोलने से पहले ही जानते हैं की हम क्या बोलेंगे।(भजन संहिता 139:4) हमारे मन मे चलने वाले हर एक विचार को परमेश्वर जानते हैं। यीशु मसीह परमेश्वर होते हुये मनुष्य के मन में चलने वाली हर बात को उनके बिना बोले जानते थे। (यूहन्ना 20:25, मत्ती 9:4, यूहन्ना 6:64)

बाइबल बताती है की शैतान शक्तिशाली है। एक समय वह सभी स्वर्ग दूतों का प्रधान था। उसके पास इतनी बौद्धिक क्षमता थी की उसने एक तिहाई स्वर्ग दूतों को परमेश्वर के साथ बलवा करने के लिए मना लिया  था। (प्रकाशित वाक्य 12:4) यहाँ तक की शैतान के स्वर्ग से गिराए जाने के बाद भी प्रधान स्वर्गदूत मिकाएल ने बिना परमेश्वर की आज्ञा के लूसिफर का सामना करना न चाहा । (यहूदा 1:19) शैतान आकाश की शैतानी सेनाओं का प्रधान है। वह ऐसी आत्मा है जो हर एक आज्ञा न मानने वाले के अंदर कम करती है। (इफिसियों 2:2) किन्तु शैतान की शक्तियों की भी सीमा है और मनुष्य के मनों को जानना उसकी शक्तियों के बाहर है।

शैतान और उसके दूतों को यदि मनुष्यों के मन में चल रही बातों को जानना है तो उसे सर्व व्यापी बनना पड़ेगा, जोकि वो नहीं है। केवल परमेश्वर हैं जो हमारे मनों को जानते हैं। यद्यपि शैतान के पास ऐसी शक्ति नहीं है फिर भी वह हजारों सालों से मनुष्य जाती को देखता और परखता आया है। और अवश्य है वो हमारे सोचने समझने और काम करने के तरीके के विषय में लगभग सटीक अंदाज़ा लगा सकता है। और इसीके आधार पर शैतान मनुष्यों के लिए लोभ लालच फंदे और ठोकर लगाने में बोहुत कामयाब रहा है। और इसलिए परमेश्वर का वचन कहता है "इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का साम्हना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।" याकूब 4:7

How to interpret bible verses


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पवित्र बाइबल वास्तव मे English में नहीं बल्कि इब्रानी भाषा मे लिखी गयी है। अनुवाद करने वाले भिन्न हैं और उनके द्वारा इस्तेमाल किये गए शब्दों का चयन उनके अपने विवेक पर होता है कि वह एक इब्रानी शब्द का क्या अर्थ निकालते हैं। 

हिंदी या अंग्रेज़ी में इब्रानी शब्द के संभव पर्यायवाची शब्द दिए जाते हैं, अनुवादक पर्यायवाची शब्दों में से जो उनको ठीक लगे वो शब्द चुन लेते हैं। अनुवादको के द्वारा गलत शब्द का चयन करने से original बाइबल का अर्थ नहीं बदल जाता। इसीलिए बाइबल के शिक्षक original बाइबल से check करते हैं कि जो शब्द इस्तेमाल किया गया है वो कितना सही है। 

उदाहरण के तौर पर: बाइबल की पहली पुस्तक उत्पति जोकि 1500 ईसा पूर्व लिखी गयी थी। 
इसके एक एक शब्द का अर्थ देखें:

1) In the beginning |  हिंदी : आदि में | इब्रानी में : 
בְּרֵאשִׁ֖ית (bə·rê·šîṯ)
यह एक singular शब्द है जिसका अर्थ है :
पर्यायवाची : आदि, आरम्भ, प्रारंभ में 

2) God | हिंदी : परमेश्वर | इब्रानी : 
אֱלֹהִ֑ים (’ĕ·lō·hîm)
यह एक plural शब्द है
पर्यायवाची : परमेश्वर, परमेश्वरों (बहु वचन ; पिता, पुत्र, पवित्रात्मा) 

3) Created | हिंदी : निर्माण करना | इब्रानी : 
בָּרָ֣א (bā·rā)
पर्यायवाची : बनाया, निर्माण किया, शून्य से बनाया

3) The Heavens | हिंदी : स्वर्ग | इब्रानी : 
הַשָּׁמַ֖יִם (haš·šā·ma·yim)
यह एक plural शब्द है
पर्यायवाची : स्वर्ग, स्वर्गओं, ब्रह्मांड की

इसके पश्चात and यानी और, इब्रानी में 
וְאֵ֥ת (wə·’êṯ)

तथा the earth, इब्रानी में
הָאָֽרֶץ׃ (hā·’ā·reṣ)
Singular
 Earth, land

***********
सारांश: आदि में त्रिएक परमेश्वर ने ब्रह्मांड और पृथ्वी तथा स्वर्ग की रचना की।।

इस प्रकार हम देखते हैं कि बाइबल की किसी आयत का सही अर्थ निकालने का सही तरीका क्या है। 


शनिवार, 22 अगस्त 2020

लेखक : उत्पत्ति की पुस्तक के लेखक की पहचान नहीं हो पाई है। क्योंकि उत्पत्ति की पुस्तक को मूसा के द्वारा नहीं लिखे जाने का कोई कारण नहीं मिलता इसलिए मूसा को ही इस पुस्तक का लेखक माना जाता है।

लेखन तिथि : उत्पत्ति की पुस्तक नहीं बताती है, कि यह कब लिखी गई थी। इसके लेखन की तिथि ईसा पूर्व 1440 और 1400 के मध्य में होने की सम्भावना है, उस समय जब मूसा ने इस्राएलियों को मिस्र से बाहर निकालने में अगुवाई की और उसकी मृत्यु हुई थी। 

लेखन का उद्देश्य : उत्पत्ति की पुस्तक को पूरी बाइबल की "विषय वस्तु का आधार" भी कहा जाता है। बाइबल की अधिकांश शिक्षाओं को उत्पत्ति की पुस्तक में मौजूद "आधार" के रूप में देखा जाता है। मनुष्य जाती के पाप में पड़ने के साथ , परमेश्‍वर के द्वारा उद्धार की प्रतिज्ञा या छुटकारे को भी इसमें उल्लेख किया गया है (उत्पत्ति 3:15)। सृष्टि, पाप की शुरुआत, उद्धार, प्रायश्चित, भ्रष्टता, क्रोध, अनुग्रह, प्रभुता, दायित्व और अन्य कई जीवन सिद्धांत उत्पति की पुस्तक में ही आरम्भ होते हैं।

जीवन के बहुत से जटिल प्रश्नों का उत्तर उत्पत्ति में ही मिलता है।

(1) मैं कहाँ से आया हूँ? 

(परमेश्‍वर ने हमारी सृष्टि की — उत्पत्ति 1:1) 

(2) मैं यहाँ पर क्यों हूँ? 

(हम यहाँ पर परमेश्‍वर के साथ संगति या सम्बन्ध रखने के लिए हैं — उत्पत्ति 15:6) 

(3) मैं कहाँ पर जा रहा हूँ? 

(मृत्यु पश्चात् हमारा गंतव्य है — उत्पत्ति 25:8)। 

उत्पत्ति की पुस्तक वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, धर्मवैज्ञानिक, घरेलू स्त्रियों, किसानों, यात्रियों, और परमेश्‍वर के जन को आकर्षित करती है। बाइबल की यह पुस्तक मानव जाति के लिए उसके अनंत निवास स्थान के लिए परमेश्‍वर की योजना को भली प्रकार से जानने का एक उचित स्त्रोत है। 

मुख्य वचन : उत्पत्ति 1:1, "आदि में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" 

उत्पत्ति 3:15, "और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा और तू उसकी एड़ी को डसेगा।" 

उत्पत्ति 12:2-3, "और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान् करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।" 

उत्पत्ति 50:20, "यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया है, जिसमें वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।" 

संक्षिप्त सार : उत्पत्ति की पुस्तक को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: आदिकालीन इतिहास और कुलपतियों का इतिहास। आदिकालीन इतिहास (1) उत्पत्ति (उत्पत्ति अध्याय 1-2); 

(2) मनुष्य का पाप में गिरना (उत्पत्ति अध्याय 3-5); 

(3) जल प्रलय (उत्पत्ति अध्याय 6-9); और 

(4) मनुष्यों का बिखर जाना (उत्पत्ति अध्याय 10-11)। 

कुलपतियों का इतिहास चार बड़े लोगों के जीवन का वृतान्त वर्णन करता है: 

(1) अब्राहम (उत्पत्ति 12-25:8); 

(2) इसहाक (उत्पत्ति 21:1-35-29); 

(3) याकूब (उत्पत्ति 25:21-50:14);

(4) यूसुफ (उत्पत्ति 30:22-50:26)।

परमेश्‍वर ने ऐसे ब्रह्माण्ड की रचना की थी, जो अच्छा और पाप रहित था। परमेश्‍वर ने मनुष्य की सृष्टि उनके संगति रखने तथा उनके साथ व्यक्तिगत् सम्बन्ध रखने के लिए की थी। आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा की विरुद्ध जाकर पाप किया जिसके परिणाम स्वरूप बुराई और मृत्यु मनुष्यों में और संसार में आ गयी।बुराई बड़ी तेजी के साथ तब तक बढ़ती चली गई जब तक कि इस संसार में केवल एक ही परिवार नहीं रह गया जो परमेश्वर का भय मानता था तथा जिसमें परमेश्‍वर ने भलाई और पवित्रता को पाया। परमेश्‍वर ने संसार में अत्यंत बढ़ चुकी दुष्टता और पाप को मिटाने के लिए जल प्रलय को भेजा, परन्तु नूह और उसके परिवार को पशुओं समेत जल जहाज में जाने के द्वारा बचा लिया। जल प्रलय के पश्चात्, मनुष्य फिर से बढ़ने लगे और पूरे संसार में फैल गए। 

तत्पश्चात जीवन फिर से पृथ्वी पर बढ़ने लगा तथा परमेश्‍वर ने अब्राहम को चुन लिया, कि उसके द्वारा वह उसके चुने हुए योग्य लोगों बढ़ाए और आखिरकार इसी योग्य और पवित्र जाती के द्वारा प्रतिज्ञा किए हुए मसीह को भेजे। चुने हुए वंश वंशावली अब्राहम के पुत्र इसहाक, और तब इसहाक के पुत्र याकूब के साथ आगे बढ़ी। परमेश्‍वर ने याकूब का नाम इस्राएल में परिवर्तित कर दिया, और उसके बारह पुत्र इस्राएल के बारह गोत्रों के पूर्वज बन गए। अपनी सर्वोच्चता में, परमेश्‍वर ने याकूब (इस्राएल) के पुत्र को यूसुफ के भाइयों के द्वारा धोखे से मारने के प्रयास के चलते मिस्र में भेज दिया। यह कार्य उसके भाइयों के द्वारा उसके साथ बुराई करने की मंशा से किया गया था, परन्तु परमेश्‍वर की योजना उसके साथ भलाई की थी और अन्तत: परमेश्वर ने याकूब और उसके परिवार को यूसुफ ही के द्वारा विनाशकारी अकाल से बचाय, यही यूसुफ मिस्र में एक बड़े पद पर पहुँच चुका था। 

प्रतिछाया : नए नियम के बहुत से विषय उत्पत्ति में ही मिलते हैं। यीशु मसीह जो कुवारी माता मरियम के द्वारा पैदा होने के कारण स्त्री का वंश है, वह शैतान की शक्ति और अधिकार को नष्ट कर देगा (उत्पत्ति 3:15) 

यूसुफ के साथ:  परमेश्‍वर की मनुष्य जाती के लिए उनके पुत्र यीशु के बलिदान के द्वारा भलाई की योजना थी। यद्यपि वे जिन्होंने यीशु को क्रूस पर चढ़वाया था, उनकी मंशा यीशु के लिए बुराई की थी। 

नूह और उसके परिवार के बचे हुए थोड़े ही थे।  डरावनी विषम और कठिन परिस्थितियों के होने के पश्चात् भी, परमेश्‍वर ने विश्‍वासयोग्य बचे हुए लोगों को संभाले रखा है। 

इस्राएलियों के बचे हुए लोग बेबीलोन की बन्धुवाई के पश्चात् यरूशलेम में वापस लौट आए; परमेश्‍वर ने यशायाह और यिर्मयाह में वर्णित सभी सावधानियों से बचाते हुए बचे हुए लोगों को संभाल कर रखा; 

इजेबेल के क्रोध से 7000 बचे हुए याजक छिपे हुए थे; परमेश्‍वर प्रतिज्ञा करते है कि बचे हुए यहूदी किसी दिन अपने सच्चे मसीह को अपना लेंगे (रोमियों 11)

यहूदी और अन्यजाति दोनों ही के लिए अब्राहम के द्वारा किया गया विश्‍वास परमेश्‍वर की ओर से वरदान और उद्धार होगा (इफिसियों 2:8-9; इब्रानियों 11)।

व्यवहारिक शिक्षा : उत्पत्ति की पुस्तक का मुख्य विषय परमेश्‍वर का अनन्तकाल से अस्तित्व में होना और उनके द्वारा ही इस संसार की सृष्टि किया जाना है। परमेश्‍वर के अस्तित्व का बचाव करने के लिए लेखक ने किसी तरह के कोई प्रयास नहीं किया है; वह तो बड़ी सरलता से कहता है, कि परमेश्‍वर सभों के ऊपर सर्वसामर्थी रूप में विद्यमान है, सदैव से था और सदैव के लिए रहेगा। ठीक इसी तरह से, हमारा भरोसा उत्पत्ति की सच्चाइयों में, उन लोगों के दावों के विपरीत भी है, जो इनका इनकार कर देते हैं। संस्कृति, राष्ट्रीयता या भाषा चाहे कुछ भी क्यों न हो, इनको एक किनारे करते हुए, सभी लोग परमेश्‍वर के सामने जवाबदेह हैं। परन्तु पाप के कारण, हम परमेश्‍वर से पृथक हो चुके हैं। परन्तु एक छोटी सी आज्ञाकारी और विश्वासयोग्य जाति इस्राएल के द्वारा परमेश्‍वर के छुटकारे की योजना मनुष्य जाति के लिए प्रगट हो गई और समस्त मानवजाति को उपलब्ध की गई है। हम उसकी योजना में आनन्दित हैं। 

परमेश्‍वर ने इस ब्रह्माण्ड, पृथ्वी, और इसमें रहने वाले सभी जीवित प्राणियों की रचना की है। हम हमारे जीवन की समस्याओं का समाधान करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं। परमेश्‍वर एक असम्भव और निराश परिस्थिति को अपने हाथ में ले लेते है और वह अद्भुत कार्यों को करते है, यदि हम मात्र उनके ऊपर भरोसा करें और उनकी आज्ञा का पालन करें, उदाहरण 

के लिए अब्राहम और सारा का सन्तानहीन होना। 

भयानक और अन्याय से पूर्ण भरी हुई बातें हमारे जीवन में घटित हो सकती हैं, जिस प्रकार यूसुफ के साथ घटित हुई थी, परन्तु परमेश्‍वर सदैव हमारे लिए भलाई को ले जाएंगे यदि हम उनमें और उनकी सर्वोच्च योजना में विश्‍वास करते हैं। जैसा कि वचन कहता है "हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं" (रोमियों 8:28)।






बुधवार, 27 मई 2020


टेलीविशन पर आने वाली सुपर हीरो फिल्में जैसे सुपरमैन, स्पाइडरमैन, हमें बहुत उत्साहित करती हैं और अक्सर बहुत से लोगों की यह इच्छा  होती है की वह सुपर हीरो वाली ताकतें उन्हें भी मिले, पर क्या वाकई में हमें उन सुपर हीरो ताकतों की जरूरत है?
अक्सर  सुपर हीरो फिल्मों में यह संदेश दिया जाता है कि बड़ी ताकतों के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। क्योंकि उनके पास अद्भुत और अलौकिक शक्तियां हैं इसलिए उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उन शक्तियों का सही इस्तेमाल करें और  बुराई नहीं बल्कि अच्छाई करें। 
पर सोचिए क्या इंसान होना अपने आप में एक सुपर पावर नहीं है। हम अपने से छोटे जीवो की जगह खुद को रख कर सोचें क्या एक चींटी के लिए या एक चूहे के लिए हम अद्भुत और अलौकिक शक्ति रखने वाले नहीं हैं। आज संसार में ऐसा कोई काम नहीं जो मनुष्य नही कर सकता। इंसान चांद पर पोहुच चुका है और अंतरिक्ष को नापने की महत्वकांशा रखता है। 
मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अक्सर उन चीजों की अभिलाषा करता है जिनको हासिल करना उसके लिए मुश्किल हो और इसी अभिलाषा को शैतान अच्छे से जानता है। उत्पत्ति 3 में शैतान ने यही लालच देकर हव्वा को बहकाया की 'तुम खुद परमेष्वर तुल्य हो जाओगे, जबकि आदम और हव्वा को कोई ज़रूरत नही थी परमेष्वर के तुल्य होने की क्योकि परमेष्वर ने खुद ही उन्हें हर तरह से योग्य बनाया था।
शैतान ने बहुत ही चालाकी से हमारे इंसान होने की सुपर पावर को हमारे ध्यान से हटाकर हमारे सामने ऐसी शख्सियतों को रखा जो हमें छोटा और कमजोर महसूस कराएं और हमें कभी ये एहसास न होने दें कि इंसान होना अपने आप में एक सुपर पावर है जो परमेष्वर से हमें मिली है। 
क्योकि हम हमारे इंसान होने की अहमियत को नही समझते इसलिए हम पर सही होने और सही करने की ज़िम्मेदारी का एहसास भी नही होता। यही कारण है बोहुत से लोग अपराध करने को बोहुत हल्की बात समझते हैं और स्वर्ग नर्क जोकि परमेष्वर का न्याय है हमसर लिए गए फैसलों पर उसे हम बोहित हल्की बात समझते हैं।
बाइबल कहती है परमेश्वर ने मनुष्य को खुद से थोड़ा ही कम बनाया है। परमेश्वर ने इंसान को हर वो गुण दिया जो कि खुद परमेश्वर के पास है। मनुष्य अपनी सोच समझ बुद्धि और शक्ति का इस्तेमाल करके जो चाहे वह कर सकता है। क्योंकि परमेष्वर ने हमें इंसान बनाया और ये जीवन हमें दिया इसलिए हमपर ये ज़िम्मेदारी है कि हम इस जीवन का सही इस्तेमाल करें और बुराई नही बल्कि अच्छाई को अपनाएं। परमेष्वर चाहते हैं कि हर इंसान स्वर्ग में अपना अनंत जीवन बिताए न कि नर्क में। जो पाप और परमेष्वर के विरूद्ध मानव जाति ने किए उनकी सज़ा भुगतने के लिए परमेष्वर ने यीशु को संसार में भेजा और यीशु ने परमेष्वर के द्वारा ठहराया हुआ उद्धहार का कार्य पूरी आज्ञाकारिता से पूरा किया इसीलिए यीशु ने क्रूस पर यह कहकर प्राण त्यागे 'पूरा हुआ' ।


रविवार, 24 मई 2020



☺️सबसे पहला जो मुझे वो है #आज़ादी।
मैं उत्तराखंड का रहनेवाला हूँ जो देवभूमि कहलाती है। बचपन से मुझे हमेशा रोका टोका जाता था #शगुन #अपशगुन के कारण। इस दिन ये न करो उस दिन वो न करो और मेरे रोज़मर्रा के जीवन पर इन सब बातों का गहरा प्रभाव था। मैं हमेशा इस फिक्र में ही रहता था कि मुझसे कोई गलती न हो जाए जिसके कारण मुझपर कोई परेशानी आये।
पर एक दिन जब मैंने अपने मन में ही ये #प्रार्थना करी की प्रभु #यीशु मसीह मैं अपना जीवन आपको देता हूं और आपको अपना प्रभु स्वीकार करता हूँ उंसके बाद मैंने अपने जीवन में बोहुत ही सकारात्मक प्रभाव महसूस किए। 
पहले जो मेरे काम अक्सर असफल होते थे अब वो #सफल होने लगे और जहाँ पहले मैं बिल्कुल साधरण व्यक्ति था जो किसी भी प्रकार से प्रभवि नही था और मेरे होने न होने से किसी को फर्क नही पड़ता था वही अब सभा में मैं प्रभावी  होने लगा। अब मैं प्रसन्न रहता था और किसी #ग्रह नक्षत्र, #काल सर्प, #वास्तु दोष और इस प्रकार की किसी भी बात का मुझपर कोई प्रभाव न रहा। जादू टोना ये सब मुझपर विफल थे। ये मेरे लिए सबसे ज़रूरी और प्रभावी #आशीष थी जो मुझे यीशु मसीह पर विश्वास करने के कारण मिली।
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☺️दूसरी मुझे मिली #कामयाबी
मेरे जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब मेरी पढ़ाई रुक गई और मेरे पास भविष्य की कोई दिशा और आशा नही थी यहि वो समय था जब मैंने हताश होकर यीशु मसीह को अपना प्रभु स्वीकार किया और उसके बाद मेरी परिस्थितियां बदली। जहां पहले मैं हताश और निराश था वहीं अब चीज़ें मेरे पक्ष में होने लगी मेरे रास्ते खुद ब खुद ही बनते चले गए और आज मैं कामयाब हु और बेहतरीन तरीके से अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा हूँ।

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☺️तीसरा मुझे मिले जीवन जीने के सही #मूल्य #Values
यीशु मसीह और बाइबल ने मुझे सिखाया शत्रुओं से प्रेम करो, गाली के बदले गाली नही बल्कि आशीष दो, सताने वालों के लिए प्रार्थना करो, हमारा शरीर परमेष्वर का मंदिर है और हमें इस शरीर में कोई अशुद्ध वस्तु जैसे मादक पदार्थ नही डालने हैं और इस प्रकार की अन्य बोहुत सी शिक्षाएं जो अच्छे #चरित्र और अच्छे #भविष्य का निर्माण करती हैं।

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☺️चौथा मुझे मिला #स्वर्ग का आश्वासन
मुझे हमेशा से इस बात की जिज्ञासा रहती थी कि मरने के बाद मेरे साथ क्या होगा। #पंडितों और #ग्रंथों की शिक्षाओं से मैं कभी संतुष्ट नही हो सका क्योंकि मुझे लगता था कि जब हमारे पंडित, ब्राह्मण और ईश्वर खुद ही गलत काम कर रहे हैं और झूठ बोल रहे हैं व्यभिचार कर रहे हैं और हम अंधों की तरह उन्हें पूज रहे हैं तो फिर उनका बताया स्वर्ग का मार्ग कैसे विश्वसनीय हो सकता है। 
पर जब मैंने यीशु मसीह के चरित्र का अध्ययन किया तब मुझे संतुष्टि मिली। एक प्रवित्र जीवन जीवन जीने वाला व्यक्ति सदा #सच बोलने वाला व्यक्ति ही स्वर्ग जैसे पवित्र स्थान का वारिस और ज्ञाता हो सकता है। इस से मुझे पूरा विश्वास और आश्वासन मिला कि यीशु मसीह मे मेरा अनंतकाल का जीवन और मेरी आत्मा सुरक्षित और मेरा स्वर्ग का मार्ग आश्वस्त है।

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☺️पांचवा जो मुझे मिला वह है #सत्य कि पहचान।
यीशु मसीह को जानने से पहले मुझे लगता था #ईसाई धर्म ही यीशु मसीह है और पश्चिमी देशों और ईसाइयों में जो कुछ होता है वो ही बाइबल सिखाती है। पर जब खुद बाइबल पढ़ी तो पाया कि यीशु मसीह की शिक्षाएं उनके अनुयाइयों के द्वारा किये जाने वाले कामों के बिलकुल विपरीत हैं।
जो बाहर से गंदा और अव्यवस्थित दिखाई देता है वह असलियत में पवित्र और सच्चा है। यीशु ने कहा जो मेरे पिता यानी परमेष्वर की पवित्र इच्छा पर चलता है केवल वह ही स्वर्ग का वारिस या स्वर्ग जाने के योग्य है। स्वर्ग जाने का मार्ग बोहुत ही कठिन और पवित्र है और थोड़े ही उसपर चलते हैं।

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☺️छठा मुझे मिला अत्यंत प्रेम करने वाले पिता परमेष्वर जिनको मेरा ख्याल है और जो हमेशा मेरे साथ रहते हैं।

यीशु मसीह को प्रेमी पिता परमेष्वर ने भेजा ताकि यीशु मेरे किये पाप और अज्ञानता की सज़ा खुदपर उठाये और पवित्र परमेष्वर के न्याय और दण्ड को खुद में पूरा कर के खुद में ही एक ऐसा द्वार बनाये जिसके द्वारा मैं परमेष्वर से अनजान और पापी होने बाद भी प्रवित्र परमेष्वर तक पोहच सकूं। क्योंकि परमेष्वर पवित्र हैं और कोई भी जिसने जीवन में छोटा सा भी पाप किया हो वह परमेष्वर के पास नही जा सकता। इसीलिए यीशु ने कहा 'मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ और बिना मेरे कोई पिता तक नहीं पहुच सकता।'

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☺️💐💐💐सातवां मुझे मिला यीशु के रूप में एक अत्यंत प्रेम करने वाला बड़ा भाई, एक सच्चा मित्र, एक प्रेमी प्रभु, मेरी गलतियों के बदले पिता से सज़ा पाने वाला मेरा शुभचिंतक भाई, हमेशा साथ रहने वाला रक्षक, मेरी ज़रूरतों को पूरा करने वाला सच्चा राजा, परमेष्वर के सामने मेरी वकालत करने वाला मेरा वकील और मेरी आत्मा का प्रेमी जो मेरी आत्मा को कभी भी नर्क में नही जाने देगा। I love you sooooooooooooooooooooooooooooooo much Jesus.

गुरुवार, 21 मई 2020

बाइबल निश्चित रूप से नहीं बताती कि कैन की पत्नी कौन थी। केवल एक ही सम्भावित उत्तर यह है कि कैन कि पत्नी उसकी बहन या भतीजी या चाचा की लड़की-की-लड़की वगैरह रही होगी। बाइबल यह नहीं बताती कि जब उसने हाबिल की हत्या की तो कैन की उम्र क्या थी (उत्पत्ति 4:8)। क्योंकि वे दोनों किसान थे, इसलिए सम्भवतया वे पूरी तरह अपने-अपने परिवारों के साथ विकसित वयस्क रहे होंगे। आदम और हव्वा ने निश्चित रूप से कैन और हाबिल के अलावा जब हाबिल मारा गया तब तक और भी सन्तानों को जन्म दिया होगा (उत्पत्ति 5:4)। यह सच्चाई है कि हाबिल को मारने के बाद कैन अपने स्वयं के जीवन के प्रति भयभीत था (उत्पत्ति 4:14) जो यह दर्शाता है कि उस समय आदम और हव्वा की सम्भवतया और भी कई अन्य संतान थीं और यहाँ तक कि पोते या पड़-पोते भी थे। कैन की पत्नी (उत्पत्ति 4:17) आदम और हव्वा की बेटी या बेटी की बेटी थी।

क्योंकि आदम और हव्वा सबसे पहले (और केवल वे ही) मनुष्य थे, उनकी सन्तानों को आपस में विवाह करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था। परमेश्वर ने अपनी जाति में ही विवाह करने के लिए तब तक मना नहीं किया था जब तक बहुत बाद में पर्याप्त लोग नहीं हो गए तब अपनी जाति में विवाह करना मना कर दिया गया था (लैव्यव्यवस्था 18:6:18)। यही कारण कि पारिवारिक यौन सम्बन्ध के परिणामस्वरूप बच्चों में अक्सर आनुवंशिक असमान्यतायें आ जाती हैं अर्थात् जब दो समान आनुवंशिक लोग (अर्थात्., भाई और बहन) से सन्तान होती हैं, परिणामस्वरूप उनमें आनुवंशिक दोष  अथवा गुणों की अधिक प्रबलता होती है। जब भिन्न परिवार के लोगों की सन्तानें होती हैं, तो यह बहुत कम सम्भव है कि एक जैसे आनुवंशिक दोष गुण माँ बाप में होंगे। सदियों से मानव की आनुवंशिकता में दोषी गुण इतने ज्यादा "प्रदूषित" हो गए हैं कि आनुवंशिकता सम्बन्धी दोष बहुत अधिक बढ़ गए, और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। आदम तथा हव्वा में कोई भी आनुवंशिक दोष नहीं थे, इसलिए उनको तथा उनकी पहली कुछ पीढ़ियों को कहीं ज्य़ादा अच्छे स्वास्थ्य के गुण उपलब्ध थे जो कि आज के समय हम में नहीं हैं। यदि कुछ होंगे भी तो, आदम और हव्वा की सन्तानों में बहुत थोड़े, आनुवंशिकता सम्बन्धी दोष थे। परिणामस्वरूप, उनका आपस में विवाह करना सुरक्षित था। 

मंगलवार, 19 मई 2020




"बाइबल" शब्द लतीनी और यूनानी शब्दों से निकल कर आया है जिसका अर्थ है "पुस्तक" जो एक सही नाम है क्योंकि बाइबल सभी लोगों के लिए, सभी समयों के लिए एक पुस्तक है। यह एक ऐसी पुस्तक है, जिसकी समानता में और कोई भी पुस्तक नहीं है।

छियासठ 66 पुस्तकें मिलकर बाइबल बनती हैं। इसमें व्यवस्था की पुस्तकें, जैसे कि लैव्यव्यवस्था, और व्यवस्थाविवरण; ऐतिहासिक पुस्तकें, जैसे कि एज्रा और प्रेरितों के काम; काव्य या पुस्तकें, जैसे कि भजन संहिता और सभोपदेशक; भविष्यद्वाणियों की पुस्तकें, जैसे कि यशायाह और प्रकाशितवाक्य; जीवनी पुस्तकें, जैसे कि मत्ती, और यूहन्ना; पत्रियाँ (औपचारिक पत्र) जैसे के तीतुस और इब्रानियों इत्यादि सम्मिलित हैं।

इसका लेखक
बाइबल को 40 अलग अलग लेखकों ने लिखा है जो भिन्न भिन्न सभ्यता, क्षेत्र और जाती से थे, बोहुत से लेखक एक दूसरे को जानते भी नहीं थे, बाइबल लगभग 1500 वर्षों के समय के अवधि में लिखी गई थी। इसके लेखक राजा, मछुआरे, पुरोहित, सरकारी अधिकारी, किसान, चरवाहे और डॉक्टर इत्यादि थे। इस पूरी विविधता के साथ भी अविश्वसनीय रूप बाइबल के मूल संदेश से एकता है तथा इसकी विभिन्न पुस्तकों में कोई आपसी मतभेद नहीं यह एक ही सामान्य विषय के साथ निर्मित हुई है।

बाइबल की एकता इस कारण है, कि अन्तत: इसका लेखक एक ही है - अर्थात् स्वयं परमेश्‍वर। बाइबल "परमेश्‍वर के द्वारा प्रेरित" है (2 तीमुथियुस 3:16) मानवीय लेखकों ने सटीकता के साथ केवल वही लिखा जो परमेश्‍वर उनसे चाहते थे कि वे लिखें और अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि यह परमेश्‍वर का सिद्ध और पवित्र वचन है (भजन संहिता 12:6; 2 पतरस 1:21)।

बाइबल विभाजन
बाइबल मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है: पुराना नियम और नया नियम। संक्षेप में, पुराना नियम एक जाति की कहानी है और नया नियम एक व्यक्ति की कहानी है। पुराने नियम में वर्णित जाती का चुनाव एक व्यक्ति - यीशु को इस संसार में लाने के एक माध्यम के रूप में किया गया था।

पुराना नियम इस्राएल की स्थापना और इसे संरक्षित रखने का विवरण देता है। परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा की थी वह इस संसार को आशीषित करने के लिए इस्राएल को उपयोग करेंगे (उत्पत्ति 12:2-3)। जब इस्राएल एक जाति के रूप में स्थापित हो गया, तब परमेश्‍वर ने उस जाति में ही आशीषों को आने के लिए एक परिवार : अर्थात् दाऊद के परिवार को चुन लिया (भजन संहिता 89:3-4)। इसके पश्चात्, दाऊद के वंश में एक व्यक्ति के आने की प्रतिज्ञा दी गई जो परमेश्वर के द्वारा वादा की हूई आशीषों को लेकर आएगा (यशायाह 11:1-10)।

नया नियम इस प्रतिज्ञा किए हुए व्यक्ति के आगमन के बारे में वर्णन सहित व्याख्या करता है। उसका नाम यीशु था, और वह पुराने नियम की भविष्यद्वाणियों को पूरी करता है जब वह एक सिद्ध और पवित्र जीवन जीता , उद्धारकर्ता बनने के लिए मर जाता, और मृतकों में से जी उठता है।

इसका मुख्य पात्र
यीशु ही बाइबल का मुख्य पात्र है - सम्पूर्ण पुस्तक वास्तव में उसके ही बारे में है। पुराना नियम उसके आगमन की भविष्यद्वाणी करता है और इस संसार में उसके प्रवेश के लिए परिस्थियाँ तैयार कर देता है। नया नियम उसके आगमन और उसके कार्यों की व्याख्या करता है जो हमारे इस पापमय संसार में उद्धार लेकर आएगा।

यीशु एक ऐतिहासिक व्यक्ति से कहीं अधिक बढ़कर है; सच्चाई तो यह है कि वह एक व्यक्ति से ही बढ़कर है। वह शरीर में परमेश्‍वर है, और उसका आगमन संसार के इतिहास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटना है। स्वयं परमेश्‍वर एक व्यक्ति बन गया ताकि वह हमें एक स्पष्ट समझ प्रदान कर सके कि वह कौन है। परमेश्‍वर कैसा दिखाई देता है? वह यीशु की तरह है; यीशु मानव रूप में परमेश्‍वर है (यूहन्ना 1:14, 14:9)।

एक संक्षिप्त सारांश
परमेश्‍वर ने मनुष्य को रचा और उसको एक सिद्ध वातावरण में रख दिया; परंतु मनुष्य परमेश्‍वर के विरूद्ध बलवा करता है और जो कुछ परमेश्‍वर ने उसके लिए रखा था, उसके लिए अयोग्य बन जाता है। परमेश्‍वर उसे अयोग्यता और पाप के कारण एक पाप के द्वारा श्रापित संसार में रख देता है परन्तु साथ ही तुरन्त सारी सृष्टि और मानवता को उसकी मूल दशा जोकि पाप रहित और अमर है उसमेमें इसे पुनर्स्थापित करने के लिए योजना का  कार्यान्वन आरम्भ कर देता है।

परमेश्वर के मानव जाती के छुटकारे की योजना के कार्यान्वन के अंतर्गत (लगभग 2000 ईसा पूर्व) अब्राहम को बेबीलोन में से कनान को जाने के लिए बुलाहट देते है । परमेश्‍वर अब्राहम, उसके पुत्र इसहाक और उसके पोते याकूब (जिसे परमेश्वर ने इस्राएल नाम दिया था) को प्रतिज्ञा देते है कि परमेश्वर उनके वंशजों के द्वारा संसार को आशीषित करेंगे। याक़ूब (इस्राएल) का परिवार मिस्र से कनान की ओर चला आता है, जहाँ वह एक जाति के रूप में विकसित हो जाता है।

लगभग 1400 ईसा पूर्व, परमेश्‍वर इस्राएल जाति के वंशजों को मिस्र से बाहर मूसा की अगुवाई में मार्गदर्शन देते हुए ले आता है और उन्हें कनान जोकि परमेश्वर के द्वारा प्रतिज्ञा की हूई भूमि है, उनकी अपनी भूमि होने के लिए दे देते है। मूसा के द्वारा परमेश्‍वर इस्राएल के लोगों को व्यवस्था देते है और उसके साथ वाचा (नियम) स्थापित करते है कि यदि वे निरन्तर परमेश्‍वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहेंगे और अपनी चारों ओर की जातियों के द्वारा किए जाने वाले घृणित कामों तथा मूर्तिपूजा के पीछे नहीं चलेंगे, तब वे सम्पन्न हो जाएँगे। यदि वे परमेश्‍वर को त्याग देते हैं और मूर्तिपूजा करते हैं, तब परमेश्‍वर उनकी जाति को नाश कर देंगे।

इसके लगभग 400 वर्षों के पश्चात्, दाऊद और उसके पुत्र सुलेमान के शासन के समय, इस्राएल एक बहुत ही बड़े और शक्तिशाली राज्य के रूप में विकसित हो गया। परमेश्‍वर ने दाऊद और सुलेमान को प्रतिज्ञा दी कि उनके वंश में से एक राजा होगा जो सदैव के लिए, अनंतकाल के राजा के रूप में राज्य करेगा।

सुलेमान के शासन के पश्चात्, इस्राएल की जाति विभाजित हो गई। उत्तर वाले दस गोत्रों को "इस्राएल" कह कर पुकारा गया और वे लगभग 200 वर्षों तक बने रहे जब तक कि परमेश्‍वर ने उनका न्याय मूर्तिपूजा के कारण नहीं कर दिया। अश्शूरियों ने इस्राएल को 721 ईसा पूर्व बन्धुवाई में कर लिया। दक्षिण के दो गोत्रों को "यहूदा" कह कर पुकारा गया और वे थोड़ा ज्यादा समय तक बने रहे, परन्तु अन्त में उन्होंने भी परमेश्‍वर की ओर पीठ फेर ली। बेबीलोन के लोगों ने उन्हें भी 600 ईसा पूर्व बन्धुवाई में ले लिया।

लगभग 70 वर्षों के पश्चात्, परमेश्‍वर उदारता के साथ कुछ बचे हुए लोगों को बन्धुवाई में से उनकी अपनी भूमि पर वापस लौटा ले आए। यरूशलेम (राजधानी) को फिर से 444 ईसा पूर्व निर्मित किया गया, और इस्राएल ने एक बार फिर से राष्ट्रीय पहचान को स्थापित किया। इस तरह पुराना नियम समाप्त होता है।

नया नियम 400 वर्षों के पश्चात् बैतलहम में यीशु के जन्म के साथ आरम्भ होता है। यीशु प्रतिज्ञा दिए हुए अब्राहम और दाऊद के वंश से आता है, वह ऐसा व्यक्ति है जो मानवजाति के लिए परमेश्‍वर की छुटकारे की योजना को पूरा करेगा। यीशु विश्वासयोग्यता के साथ अपने कार्य को पूरा करता है - वह पाप के लिए मर जाता है और मृतकों में से जी उठता है। मसीह की मृत्यु इस संसार के साथ नई वाचा (नियम) का आधार है। वे सभी जो यीशु में विश्वास करते हैं पाप से बचाए जाते और अनंतकाल तक जीवित रहते हैं।

उसके जी उठने के पश्चात्, यीशु ने अपने चेलों को लोगों को बचाने के लिए, उसके जीवन और उसकी सामर्थ्य के सन्देश को फैलाने के लिए भेज दिया है। यीशु के चेले उद्धार का शुभ सन्देश फैलाने के लिए प्रत्येक दिशा की ओर चले गए। उन्होंने एशिया माईनर, यूनान और सारे रोमी साम्राज्य की यात्राएँ कीं। नया नियम इस भविष्यद्वाणी के साथ समाप्त होता है कि यीशु एक दिन इस अविश्‍वासी संसार का न्याय करने और सृष्टि को श्राप से मुक्त करने के लिए पुनः आने वाला है।

 



बाइबल में सृस्टि की उत्पती से लेकर सृस्टि के अंत तक कि सारी जानकारी मिलती है। परंतु ये जानकारी रहस्यमयी तरीके से संकेतों मैं छुपी हुई है जिसे वर्तमान समय मैं technology की सहायता से खोजना आसान हो गया है।
संसार का ऐसा कोई सवाल नही जिसका जवाब बाइबल में न हो। 

आइये देखते हैं बाइबल संसार और मानव जाति की उत्पत्ति और अंत के बारे में क्या बताती है।

बाइबल देखने में एक पुस्तक है पर यह 66 किताबों को एकसाथ जोड़ने से बना एक संग्रह है। इन 66 किताबों को लगभग 1600 सालो के दौरान लिखा गया और 40 विभिन्न लोगों ने परमेश्वर से प्रेरणा पाकर इनको लिखा। अद्भुद तरीके से सभी लेखक एक ही परमेश्वर के विषय में बताते हैं और इनमें आपस में कोई मतभेद नहीं है जो लगभग असंभव बात है और अपने आप में एक चमत्कार है।

बाइबल की सबसे पहली पुस्तक यानी उत्पति इसकी पहली आयत कहती है आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की और दूसरी आयत कहती ही पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी तथा भूमि गहरे जल में डूबी हुई थी और पृथ्वी पर कोई प्रकाश भी न था। 

पहली आयत में पृथ्वी और सृष्टि के बनाये जाने का विवरण है लेकिन दूसरी आयत मैं पृथ्वी के बंजर और वीरान होने का दृश्य दिखता है। आगे ध्यानपूर्वक पढ़ने पर पता चलता है कि प्रकाश को पृथ्वी पर आने से परमेश्वर के द्वारा रोका गया था जिसके कारण पृथ्वी अंधकार में पड़ी थी। 

यहां आपको बता दें बाइबल को कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है इसलिए किसी भी शब्द का अर्थ निकालने के लिए सबसे बेहतर विकल्प है original भाषा का शब्द देखकर खुद उसके अर्थ check करना। इसही तरीके से bible स्कॉलर्स study और रिसर्च करते हैं।

अब ये सवाल उठता है परमेश्वर के द्वारा बनाई गई पृथ्वी बेडौल और सुनसान क्यो पड़ी थी ? और परमेश्वर ने प्रकाश को पृथ्वी पर पोहुचने से क्यो रोक दिया था।

क्योंकि यहोवा जो आकाश का सृजनहार है, वही परमेश्वर है; उसी ने पृथ्वी को रचा और बनाया, उसी ने उसको स्थिर भी किया; उसने उसे सुनसान रहने के लिये नहीं परन्तु बसने के लिये उसे रचा है। वही यों कहता है, मैं यहोवा हूं, मेरे सिवा दूसरा और कोई नहीं है। *यशायाह 45 : 18*

इसका जवाब हम आगे देखेंगे।

लेकिन इस से पहले हम जान लेते हैं कि पूर्वकाल मैं जीवन कैसा था और उस समय के मनुष्य और जीव जंतु कैसे थे।

वैज्ञानिकओं के अनुसार पृथ्वी पर लाखों साल पहले से जीवन था। बड़े बड़े डाइनासोर के कंकाल इस बात के सबूत हैं। लेकिन एक उल्का पिंड के पृथ्वी पर टकराने के कारण डाइनासोर समाप्त हो गए और पृथ्वी लंबे समय तक जमी रही जिसे शीत युग कहते हैं। और ये शीत युग इतनी तेज़ी से आया कि जीवो को संभलने का मौका भी नही मिला, कुछ जानवरो के अवशेष मिले जिनके मुह में घास पड़ी हुई थी और वह ऐसे ही जम गए।

बाइबल के अनुसार हमारी वर्तमान पृथ्वी पर आज जो जीवन है, उस से पहले भी पृथ्वी पर जीवन था और वह जीवन ज़्यादा समृद्ध था और उस समय के प्राणियों का जीवनकाल कहीं ज़्यादा समृद्ध और लंबा था या संभवतः उनको अमरत्व प्राप्त था। इसी दशा में पृथ्वी लाखों या करोड़ो साल रही।

वैज्ञानिकों को भीमकाय मनुष्यों के कंकाल मिले हैं जोकि लाखों साल पुराने है और जिनका आकार वर्तमान मनुष्यों से दो या 3 गुना ज्यादा है, जिससे ये साबित होता है कि पूर्वकाल में दानव आकार के मनुष्य मनुष्य रहते थे।

विज्ञान के अनुसार dianosor युग का अंत आकाश से आई एक उल्का के टकराने से हुआ। पर बाइबल इस विषय में क्या कहती है?

जब मैं ने पृथ्वी की नेव डाली, तब तू कहां था? यदि तू समझदार हो तो उत्तर दे। जब कि भोर के तारे एक संग आनन्द से गाते थे और परमेश्वर के सब पुत्र जयजयकार करते थे? अय्यूब 38:4,7

इस आयत के अनुसार जब परमेश्वर ने पृथ्वी बनाई तब स्वर्गदूत आनंद कर रहे थे यानी स्वर्गदूत पहले बनाये गए थे। यहां पर ध्यान दें ये आत्मिक क्षेत्र है इसलिए इसमें समय की गणना हम नहीं कर सकते। क्योंकि लिखा है

हे प्रियों, यह एक बात तुम से छिपी न रहे, कि प्रभु के यहां एक दिन हजार वर्ष के बराबर है, और हजार वर्ष एक दिन के बराबर हैं। 2 पतरस 3:8

*************
अब हम आते हैं पहले सवाल के जवाब पर।


बाइबल बताती है पूर्व काल में पृथ्वी और इसपरके सभी प्राणियों का सारा नियंत्रण परमेश्वर के द्वारा बनाये गए सर्वश्रेष्ठ स्वर्गदूत ल्युसिफर के पास था। ल्युसिफर के अधीन सभी स्वर्गदूत थे और पृथ्वी पर का सारा नियंत्रण इस ही अग्रणी स्वर्गदूत के पास था। ल्युसिफर का अर्थ होता है प्रकाश रखने वाला।

परमेश्वर ने ल्युसिफर को वो गुण दिए जो किसी और स्वर्गदूत के या सृस्टि मैं किसी और के पास नहीं थे।

ल्युसिफर का काम था सारी पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा करना और सृष्टि के सभी जीवों को परमेश्वर के प्रेम और उनके सभी गुणों से अवगत कराना।

पर बाइबल बताती है कि कालांतर में एक ऐसा समय आया जब ल्युसिफर अपने गुणों और श्रेष्ठता के कारण घमंड से भर गया और उसने परमेश्वर के एक तिहाई स्वर्गदूतों के साथ मिलकर परमेश्वर से विद्रोह किया । ल्युसिफर चाहता था कि पृथ्वी और उसके सभी जीव परमेश्वर की नही बल्कि ल्युसिफर की महिमा करें। 

क्योंकि परमेश्वर सिद्ध और पवित्र है इसलिये कोई भी या कुछ भी जिसमे अशुद्धता या किसी भी प्रकार का curroption हो वो परमेश्वर के साथ नही रह सकता । इसलिये परमेश्वर ने ल्युसिफर को स्वर्ग से पृथ्वी पर पटक दिया और ल्युसिफर तथा उसके साथ के सभी विद्रोही स्वर्गदूतों के लिए दंड के तौर पर नर्क में उसे डाला जहां पर आग और गंधक थे। और परमेश्वर ने क्रोध में पृथ्वी को भी एक क्षण में बंद कर दिया और पृथ्वी जलमग्न होकर जम गई। इस ही स्थिति में पृथ्वी संभवतः लाखों सालों तक रही।
तत्पश्चात परमेश्वर का क्रोध शांत हुआ और परमेश्वर का आत्मा जलमग्न पृथ्वी के ऊपर पर मंडराया। इस प्रकार परमेश्वर ने पृथ्वी को पुनः शुरू किया और एक एक करके परमेश्वर ने सभी जीवों और वस्तुओं को बनाया। 

जब सब वस्तुए बन गयी तब परमेश्वर ने मनुष्य को खुदके स्वरूप और समानता मैं बनाया। परमेश्वर ने मनुष्य को हर वो  गुण दिए जो खुद परमेश्वर में थे। प्रेम, दया, करुणा, कृपा बुद्धि और इन सभी गुणों के साथ साथ परमेश्वर ने मनुष्य को स्व इच्छा दी यानी मनुष्य को अपने चुनाव खुद करने की पूरी स्वतंत्रता दी । सिद्ध परमेश्वर हमारे हर निर्णय को पहले से जानने के बाद भी कभी भी मनुष्य के किसी निर्णय में दखल नही दे सकते थे और न ही मनुष्य को बाध्य कर सकते थे । किसी भी विषय में परमेश्वर हमारे द्वारा किये गए चुनाव के आधार पर ही हमारे साथ बर्ताव करते हैं।

परमेश्वर चाहते थे कि मनुष्य अपनी स्व इच्छा तथा पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करे और परमेश्वर के साथ संगति रखे । परमेश्वर ने पहले मनुष्य यानी आदम को जब बनाया तब उसमें मृत्यु या बीमारी नही थी और पृथ्वी भी आशीषित थी, पेड़ पौधे कभी मुरझाते न थे तथा जानवर भी मनुष्यो के साथ निडर रहते थे और एक दूसरे को नही खाते थे।

परमेश्वर ने प्रथम मनुष्य की इच्छा और चुनाव को जांचने के लिए आज्ञा पालन का एक छोटा सा test दिया। 

परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग से निष्कासित स्वर्गदूत ल्युसिफर इस समय तक पृथ्वी पर मौजूद था जो अपने दंड के कारण परमेश्वर तथा उनकी सारी सृष्टि से घृणा करता था। परमेश्वर ने मनुष्य के खाने के लिए बोहुत सारे फल बनाये थे । पर मनुष्य की आज्ञाकारिता और समर्पण को परखने के लिए परमेश्वर ने आदम को एक आज्ञा दी कि वह भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल न खाए। 

आदम को भी उस वृक्ष का फल खाने की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि और भी सब तरह के फल मौजूद थे। 

इस समय तक परमेश्वर आदम के लिए एक सहायक हव्वा यानी स्त्री को भी बना चुके थे। 

जब ल्युसिफर यानी शैतान ने देखा कि परमेश्वर ने पृथ्वी और उसपर की सभी चीजों पर अधिकार रखने के लिए आदम और हव्वा को बनाया है तब शैतान ने आदम हव्वा को अपने जैसा अयोग्य और दूषित बनाने की मंशा से उनके पास गया और उसने साँप के शरीर मे बसकर हव्वा से कहा कि वह परमेश्वर की आज्ञा के विपरीत जाकर उस वृष का फल खाएं जिसे खाने के लिए परमेश्वर ने मना किया था। 

हव्वा शैतान के बहकावे में आ गयी उसने परमेश्वर की आज्ञा तोड़ दी तथा ऐसा ही आदम से भी करवाया। परमेश्वर ने आदम हव्वा को पहले ही ये चिता दिया था जिस क्षण तुम उस वृक्ष का फल खाओगे सही क्षण भर जाओगे। इस मृत्यु का अर्थ था अमरत्व खत्म हो जाना तथा आत्मिक मृत्यु और परमेश्वर से दूरी। क्योकि किसी भी प्रकार की अपवित्रता परमेश्वर के साथ नही रह सकती थी।

परमेश्वर मनुष्य जाति या आदम हव्वा से प्रेम करते थे इसलिए परमेश्वर ने पहले से ही मनुष्य जाति के उद्धहर की योजना बना रखी थी। 

परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने के बाद मनुष्य परमेश्वर से दूर हो गया और इसका फायदा शैतान ने उठाया। शैतान ने मनुष्य को और ज़्यादा बुरा बना दिया और समय के साथ मनुष्य जाति में बुराइयां अधिकाधिक बढ़ती गयी। 

जैसे जैसे पीढियां आगे बढ़ती गयी मानव जाति परमेश्वर को भूलती गयी और शैतान की ओर बढ़ती गयी। मनुष्यो के स्वभाव में बुराई घर कर गयी। शैतान ने मनुष्यों को परमेश्वर से दूर बनाये रखने के लिए परमेश्वर के बोहुत सारे विकल्प दिए और मनुष्य पेमेश्वर की बजाए उनकी बनाई चीजों और जीवो की उपासना करने लगा। 

मनुष्यो के मन में परमेश्वर का ज्ञान हमेशा रहा और उनकी बनाई अदभुद सृस्टि से परमेश्वर की पहचान करना मुश्किल नही था परंतु मनुष्य जाति हमेशा अनभिज्ञ बनी रही और परमेश्वर को जानने का प्रयास नहीं किया। मनुष्य जाति के ऐसे स्वभाव के कारण परमेश्वर मनुष्य जाति को एक विद्रोही जाती की तरह देखते हैं। 

क्योकि मनुष्य जाति ने परमेश्वर के पीछे न गयी न परमेश्वर की खोज की बल्कि इसके विपरीत शैतान के पीछे गए उसके द्वारा सिखाये गए काम किये, हत्या बुराई, स्वभाव के विपरीत व्यवहार, लालच, घृणा आदि। इसीके परिणाम स्वरूप मनुष्यो को भी वही सज़ा मिलनी थी जो शैतान को मिली यानी अनंतकाल का नर्क।

परमेश्वर मानवजाति से बेहद प्यार करते थे इसलिए परमेश्वर मानवजाति के उद्धार की योजना सृष्टि की शुरुआत से पहले ही बना ली थी। यहां ये गौर करना ज़रूरी है की परमेश्वर सबकुछ पहले से पता होने के बावजूद भी किसी भी कार्य में दखल नही दे सकते क्योंकि सिद्धता या perfection परमेश्वर का एक गुण है। 

सो परमेश्वर ने मानव जाती के उद्धहर की योजना के अंतर्गत अपने वचन को देह धारण करवाई क्योकि खुद परमेश्वर के इलावा और कोई योग्य न था जो इस कार्य को कर सके। परमेश्वर ने समय समय पर उनसे प्रेम रखने वाले लोगों के द्वारा भविष्यवाणी करके ये प्रकट किया उद्धारकर्ता कैसा होगा और वो कैसे आएगा तथा वो किस प्रकार से मानव जाति को श्राप मुक्त करेगा।

अब परमेश्वर के द्वारा भेजे गए मसीहा यानी यीशु मसीह को वोहि सबकुछ दोबारा करना था जो प्रथम आदम नही कर पाया और विफल हो गया। 
यीशु मसीह को परमेष्वर का पुत्र होना था क्योंकि प्रथम आदम भी परमेष्वर के द्वारा ही सृजा गया था।
यीशु मसीह को आदम केसमान ही के पवित्र और निर्दोष जीवन जीना था जोकि यीशु मसीह ने बखूबी किया।

एक तरफ तो यीशु मसीह को आदम की गलती को ठीक करना था और दूसरी तरफ आदम की और तब से लेकर वर्त्मान समय तक मनुष्यो के सभी पापों की सज़ा भुगतनी थी 

To be continued. 


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